जानिए योगासन के 10 प्राचीन महत्वपूर्ण तथ्य

योग क्या है?

  1. ‘योग’ का अर्थ है ‘जुड़ना’। ‘योग’ शब्‍द का उद्भव संस्कृत शब्द ‘युज्’ से हुआ है, जिसका अर्थ होता है जोड़ना, बांधना अथवा मिलाना। योग दुखों एवं कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए आत्मा एवं परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। पाणिनी के व्याकरण के अनुसार ‘योग’ शब्‍द के तीन अर्थ हैं – मिलन (युजिर्योगे), समाधि (युज समाधौ) एवं संयम (युज संयमने)। योग मूलत: आध्‍यात्मिक विज्ञान है।

 

योगासन क्या है?

2. ‘आसन’ शब्‍द को संस्‍कृत के शब्‍द ‘अस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है बैठना।

3. मॉनियर विलियम्‍स ने आसन शब्‍द से जुड़े हुए अर्थों की लंबी सूची दी है: ‘उपस्थित होना, विद्यमान रहना, निवास करना, वास करना, ठहराना, शांत बैठना, टिकना, एक ही स्थिति में बने रहना’ (संस्‍कृत डिक्‍शनरी, मॉनियर विलियम्‍स, 1963, पृष्‍ठ 159)।  योगासन की लोकप्रियता को इसी तथ्‍य से मापा जा सकता है कि योगासन को ही कई बार संपूर्ण योग मान लिया जाता है।

 

योग ऋषि मुनि द्वारा

4. योग के आरंभिक प्रणेता महर्षि पतंजलि ने इस संदर्भ में योग को आठ अंग वाला मार्ग बताया है, जिसे अष्‍टांगयोग कहा जाता है। अष्‍टांगयोग में आसन को तीसरे स्‍थान पर रखा गया है।  पतंजलि के अनुसार स्थिर एवं सुविधापूर्ण स्थिति ही आसन होती है:

स्थिरसुखमासनम्। – पा. यो. सू. 2/46

इस परिभाषा से स्‍पष्‍ट है कि कोई शारीरिक मुद्रा, जिसे पर्याप्‍त लंबे समय तक बनाए रखा जा सकता है, आसन कही जा सकती है।

 

5. हठयोग के ग्रंथों में आसनों का सबसे विस्‍तृत वर्णन किया गया है। हठयोग ने आसन को इतनी प्रतिष्‍ठा दी है कि कभी-कभी आसन के विचार को ही हठयोग कह दिया जाता है। हठप्रदीपिका ने आसनों को प्रथम स्‍थान पर रखा है।

हठस्य प्रथमाङगत्वादासनं पूर्वमुच्यते। – ह.प्र.1/17

6. हठयोग विभिन्‍न रोगों से बचाव एवं उनके उपचार के लिए भी विभिन्‍न आसनों की सलाह देता है।

गोरक्षनाथ ने गोरक्षशतक में षडांगयोग का समर्थन किया है, जहां आसनों को पहला अंग बताया गया है।

आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽव धारणा।

ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्।। गो. श.4

जैसा कि घेरंडसंहिता में घेरंडार्षि ने स्‍थापित किया है, घटस्‍थयोग को सात अंगों की श्रृंखला में द्वितीय स्‍थान दिया गया है।

शोधनं दृढ़ता चैव स्थैर्य धैर्य च लाधवम्।

प्रत्यक्षं च विनिर्लिप्तं घटस्य सप्तसाधनम्। घे. सं. 1/9

7. हठयोग की पुस्‍तकों में विभिन्‍न प्रकार के आसनों का उल्‍लेख किया गया है। इन आसनों को योगियों ने अपने अवलोकन के आधार पर प्रकृति से अपनाया है। ये मुद्राएं प‍शुओं एवं पक्षियों से ही नहीं बल्कि प्रकृति में निर्जीव वस्‍तुओं से भी ली गईं तथा उन्‍हीं के अनुसार उनके नाम भी रखे गए।

हठप्रदीपिका के अनुसार आसन करने से (मानसिक तथा शारीरिक) स्‍वास्‍थ्‍य प्राप्‍त होता है, हल्‍केपन की अनुभूति होती है। यह विकारमुक्‍त शरीर एवं आनंद भी प्रदान करता है।

कुर्यात्तदासनं स्थैर्यमारोग्यं चाङ्गलाधवम्   + ह.प्र.1/17

देहारोग्यसुखप्रदाः। ह. र. 3/88

8. योगरसायन पुस्‍तक कहती है कि अन्‍य यौगिक क्रियाएं करने के लिए आसन महत्‍वपूर्ण होते हैं। ये शरीर में स्थिरता लाते हैं, जिसके बगैर मन स्थिर नहीं हो सकता।

9. समाधि की अवस्‍था से आसन की पहचान होती है। तेजोबिंदूपनिषद आसन को ऐसी अवस्‍था बताता है, जिसमें कोई व्‍यक्ति लंबे समय तक ब्रह्मन का ध्‍यान करने में सक्षम होता है।

आसनं तद्विजानीयादन्यत्सुखविनाशम्। – ते. बि. उ. 1/25

10. अपरोक्षानुभूति वेदांत (श्‍लोक 12) भी आसन को ऐसी अवस्‍था के रूप में परिभाषित करता है, जिसमें ब्रह्म का सतत प्रतिबिंब आसानी से संभव है।

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