वस्ति योग क्रिया विधि, लाभ और सावधानी

वस्ति योग क्रिया क्या है। Vasti yoga in hindi

वस्ति का अर्थ है होता है ‘उदर का निचला भाग’। वस्ति योग क्रिया में उदर के निचले भाग विशेषकर पाचन तंत्र को स्वच्छ करने के लिए प्रैक्टिस किया जाता है। यह आंतों को साफ करने का एक प्राचीन क्रिया है। वस्तिकर्म में गुदा मार्ग के द्वारा पानी या वायु को बड़ी आंत में खींचा जाता है और फिर इसको निकाल दिया जाता है। इससे बड़ी आंत के निचले हिस्से को साफ करने में मदद मिलती है।

 

वस्तिकर्म के प्रकार। Types of Vasti yoga kriya in Hindi

वस्तिकर्म दो प्रकार का होता है।

  1.  जलवस्ति (जल से यौगिक एनीमा)
  2. स्थलवस्ति/वायुवस्ति (शुष्क यौगिक एनीमा अथवा वायु से यौगिक एनीमा)।

जलवस्ति क्रिया जल में की जाती है जबकि शुष्क अथवा स्थलवस्ति भूमि पर अर्थात् वायु में की जाती है। जलवस्ति को श्रेष्ठतर बताया जाता है क्योंकि यह आंतों को पूरी तरह साफ कर देती है। जलवस्ति (जल के साथ यौगिक एनीमा)  उत्कटासन की स्थिति में नाभि तक पानी में बैठें। एक नली गुदा में डालें और गुदा को सिकोड़ें। पानी के साथ सफाई की यह क्रिया वस्तिकर्म (जलवस्ति) कहलाती है।

 

जलवस्ति विधि। Jalbasti steps in Hindi

  • पानी को गुदा में खींचते हुए उड्डीयानबंध तथा मध्यनौली करें।
  • कुछ समय के लिए रुकें।पानी से बाहर आएं, शौचालय में जाएं तथा जल एवं मल का त्याग कर दें।
  • यह क्रिया तब तक दोहराएं, जब तक मल बाहर नहीं चला जाए।
  • मध्यनौली एवं नौलि बार-बार करें।
  • सूखा मल निकालने के लिए पानी को दस मिनट तक भीतर ही रोकना चाहिए।
  • क्रिया तब तक दोहराई जानी चाहिए, जब तक पानी के साथ मल आना खत्म नहीं हो जाए।बचा हुआ जल अथवा वायु निकालने के लिए पांच बार धीरे-धीरे शवासन, पाषिणीमुद्रा तथा भुजंगासन करना चाहिए।

 

जलवस्ति  सावधानियां। Jalbasti precautions in Hindi

  • यह क्रिया खाली पेट की जानी चाहिए।
  • नली भीतर से खोखली होनी चाहिए।
  • एक सिरे पर इसका छिद्र इस प्रकार होना चाहिए कि कनिष्ठिका अंगुली भीतर जा सके और दूसरे सिरे पर मध्यमा अंगुली जाने योग्य बड़ा छिद्र होना चाहिए।
  • बादल छाए होने पर, बारिश वाले या तेज हवा वाले मौसम में यह क्रिया नहीं की जानी चाहिए।
  • गुदा से रक्तस्राव एवं अतिसार की स्थिति में इसे नहीं किया जाना चाहिए।

 

जलवस्ति लाभ। Jalbasti benefits in Hindi

  1. वायु, पित्त तथा बलगम के कारण होने वाले अन्य सभी  रोगों को दूर करता है।
  2. वस्ति क्रिया व्यक्ति को अत्यधिक शक्तिशाली एवं अत्यधिक तेजस्वी बनाने में मदद करती है।
  3. जठराग्नि को बढ़ाती है।
  4. ग्रंथियों में वृद्धि समाप्त करती है, तिल्ली एवं ड्रॉप्सी के रोग नष्ट करती है तथा आनंद में वृद्धि करती है।
  5.  यह वात, पित्त एवं कफ की अधिकता के कारण होने वाले रोग, त्वचा रोग एवं कुष्ठरोग तक का उपचार किया जा सकता है।
  6. वस्ति से आंतें साफ होती हैं तथा यह क्रिया आंत के निचले हिस्से से जीवाणु, पुराने मल, कृमि आदि को समाप्त करता है।
  7. इससे ऊर्जा उत्पन्न होती है, शक्ति बढ़ती है तथा उदर की पेशियों पर नियंत्रण होता है।
  8. इससे मूत्र संबंधी रोगों, आंतों के रोगों एवं वायु विकारों में लाभ मिलता है।
  9. गर्मी को शांत करने हेतु वस्ति का प्रयोग करते हैं।यदि उपवास करना हो तो आंत को पूरी तरह साफ करने हेतु वस्ति करने का परामर्श दिया जाता है ताकि शरीर का संपूर्ण शुद्धिकरण हो सके। वस्ति क्रिया से मलाशय साफ होता है।कबि्ज़यत दूर करने में भी सहायक है।

 

स्थलवस्ति (शुष्क एनीमा) विधि।  Sthalvasti steps in Hindi

  • पश्चिमोत्तानासन में बैठें तथा वायु को आंतों में खींचते हुए 25 बार अश्विनीमुद्रा करें।
  • वायु को कुछ समय रोकें और उसके पश्चात् निकाल दें।.

 

4 स्थलवस्ति लाभ । 4 Sthalvasti benefits in Hindi

  1. यह मलाशय को साफ करती है।
  2. यह गैसों का निवारण करती है तथा कबि्ज़यत में लाभकारी होती है।
  3. कफ के कारण होने वाले रोगों को वस्ति द्वारा शरीर से दूर किया जा सकता है।
  4. वस्ति क्रिया करने से भूख बढ़ती है तथा चेतना एवं मस्तिष्क का शुद्धिकरण होता है।

 

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