धौति योग क्रिया विधि, लाभ और सावधानी।Dhauti Yoga Steps, Benefits And Precautions

धौति योग क्रिया क्या है ?

आपके शरीर को स्वस्थ रखने के लिए धौति क्रिया योग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। धौति क्रिया समूचे पाचन मार्ग को स्वच्छ करती है और साथ ही साथ इसको  सुचारू भी बनाती है। धौति से बासी पित्त एवं श्लेष्म साफ होता है और इस प्रकार रक्त से अशुद्धियां दूर करने में सहायता होती है। हठप्रदीपिका केवल वस्त्रधौति की क्रिया का वर्णन करती है, जबकि घेरंडसंहिता शरीर को स्वच्छ करने हेतु चार प्रकार की धौति क्रियाओं का उल्लेख करती है। सामान्य स्वास्थ्य एवं चिकित्सा हेतु यहां कुछ महत्वपूर्ण धौति क्रियाओं का वर्णन किया गया है।

धौति योग क्रिया विधि, लाभ और सावधानी।Dhauti Yoga Steps, Benefits And Precautions
Dhauti steps and benefits

कुंजल/गजकरणी/वमनधौति

‘कुंजल’ शब्द ‘कुंजर’ से आया है, जिसका अर्थ है ‘हाथी’। गज भी हाथी का समानार्थी है। अतः इस क्रिया को गजकरणी भी कहते हैं। हाथी अपनी सूंड़ से पानी खींचता है और उसे सूंड़ से ही बाहर निकालता है, इस प्रकार शरीर को सभी रोगों से मुक्त करता है। इसी प्रकार जो भी शरीर के भीतर गया है, उसे बाहर निकालकर कोई भी व्यक्ति अपने शरीर को सभी प्रकार के रोगों से मुक्त रख सकता है। कुंजल क्रिया से व्यक्ति अपने शरीर को उसी प्रकार साफ कर सकता है, जैसे बर्तन को गर्म जल से साफ किया जाता है। घेरंडसंहिता में इस क्रिया को वमनधौति कहा जाता है।

कुंजल/गजकरणी/वमनधौति की विधि

  • गुनगुने नमकीन पानी का जग पास रखें।
  • कागासन में बैठें तथा हाथों को घुटनों पर रख लें।
  • इसी अवस्था में बैठकर लगातार 4-5 गिलास नमकीन पानी पी लें।
  • अब खड़े होकर दोनों पैर आपस में जोड़ें तथा आगे को झुक जाएं।
  • बायां हाथ पेट पर रखें। दायें हाथ की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियां गले में डालें ऊपरी पाचन मार्ग को सहलाएं। जल बाहर आना आरंभ हो जाएगा।
  • जैसे ही जल बाहर आना आरंभ हो और जब तक लगातार मुंह से निकलता रहे, अंगुलियों को मुंह से बाहर रखें। जल आना बंद हो जाए तो यही क्रिया दोहराएं।
  • यदि अंगुलियां डालने के बाद भी जल बाहर नहीं आए तो इसका अर्थ है यह हुआ कि अब जल अंदर  रहा।

कुंजल/गजकरणी/वमनधौति सावधानियां

  • खड़े होकर जल का सेवन नहीं करें।
  • बाहर निकलते जल का स्वाद यदि कड़वा लगे तो एक गिलास जल और पिएं तथा वमन करें।
  • गुनगुने जल का ही सेवन करें। बहुत गर्म या बहुत ठंडे जल का नहीं।
  • इस क्रिया के दो घंटे बाद ही स्नान करना चाहिए।
  • पेट साफ होने के बाद इस को करें।
  • हृदय रोग अथवा रक्तचाप के रोगियों को विशेषज्ञ के निर्देशन के बिना ऐसा नहीं करना चाहिए।

कुंजल/गजकरणी/वमनधौति के लाभ

  • इस क्रिया से ऊपरी पाचन तंत्र तथा श्वसन तंत्र की सफाई हो जाती है।
  • इस क्रिया से शरीर से विषैले पदार्थ की मुक्ति पाया जा सकता है।
  • पेट को नियमित रूप से धोने के कारण स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
  • इस क्रिया से ग्रंथियों को अधिक क्षमता से कार्य करने में सहायता मिलती है।
  • कुंजल के दौरान होने वाले शक्तिशाली संकुचन से उदर पेशियां सुदृढ़ होती हैं और पेट बेहतर तरीके से कार्य करता है।
  • यह अतिरिक्त वसा को कम करने में मदद करता है।
  • कुंजल शरीर से अशुद्धियों को दूर करता है, जो अम्लता, श्वास में दुर्गंध, बलगम तथा गले में दर्द देकर शरीर को दूषित करती हैं।
  • कुंजल से उन व्यक्तियों को बहुत लाभ होता है जिसमें पित्त का अधिक स्राव होता है जो आंत से पेट में पहुंचकर मुंह को कड़वा कर देता है और इससे उलटी करने की इच्छा हो रही है।
  • कुंजल से दमा के रोगियों को लाभ मिलता है।

वस्त्रधौति (वस्त्र से सफाई करना)

‘वस्त्र’ का अर्थ है कपड़ा। पेट एवं भोजन नली को कपड़े से साफ करने की क्रिया वस्त्रधौति है। इस क्रिया में गीले कपड़े की लगभग 4-5 सेंटीमीटर चौड़ी और लगभग 6 मीटर लंबी पट्टी को धीरे-धीरे निगला जाता है और उसके बाद बाहर निकाल लिया जाता है। इस क्रिया को धौति या आंतरिक शोधन विधि कहते हैं।

वस्त्रधौति के लिए कपड़ा कैसे तैयार करें ?

इसमें बारीक मुलायम सूती कपड़े का तीन से छह इंच तक चौड़ा और आठ गज लंबा टुकड़ा लें। ध्यान रहे इस कपड़े  में कहीं  कोई गाँठ न हो।  कपड़े को साबुन और पानी से अच्छी तरह से धो लें। उसके बाद इसे पांच मिनट तक पानी में उबालें। ठीक से निचोड़ें तथा साफ स्थान पर सुखा लें। जब यह पूरी तरह सूख जाए तो इसे लपेटकर इसका पिंड बना लें तथा इस पिंड को साफ उबलते पानी में रख लें।

वस्त्रधौति की विधि

सबसे पहले आप कागासन में बैठें तथा पिंड का एक छोर तर्जनी एवं मध्यमा अंगुलियों में इस तरह फंसाएं कि छोर अंगुलियों के सिरे पर रुका रहे।

मुंह को पूरा खोलकर कपड़े का एक सिरा गले के भीतर ले जाएं, दूसरा सिरा जीभ पर फैलाएं और अंगुलियों को इस तरह बाहर लाएं कि कपड़ा उसी तरह रहे। जीभ हिलाकर कपड़े को धीरे-धीरे निगलना आरंभ करें।

यदि कपड़ा गले में फंस जाता है और नीचे नहीं जाता है तो एक घूंट गर्म पानी पी लें किंतु अधिक पानी नहीं पिएं क्योंकि पेट में कपड़ा भरना है, पानी नहीं। कपड़ा निगलते रहें और वमन नहीं होने दें।

जब दो-तिहाई कपड़ा निगल लिया जाए तो शेष कुछ इंच कपड़े को मुंह से बाहर लटकता रहने दें।
खड़े हो जाएं तथा हाथों को घुटनों पर रखें और पेट को बाईं ओर से इस प्रकार घुमाते हुए नौली क्रिया करें।

कपड़ा बाहर निकालने के लिए बाहरी छोर पकड़ें और धीरे धीरे बाहर खींच लें।


वस्त्रधौति की सावधानियां एवं सतर्कता

ध्यान रखें कि कपड़ा तालु से स्पर्श नहीं करे और जीभ पर ही रहे। पहले दिन केवल आधा गज कपड़ा निगला जाना चाहिए।

धीरे धीरे अधिक कपड़ा निगलें।

जिनको पित्त की समस्या है उसे गर्म पानी के बजाय दूध में कपड़ा भिगोना चाहिए।

यदि निगलते समय वमन की इच्छा लगातार हो तो कपड़े में शहद लगाया जा सकता है।

लगभग आठ इंच कपड़ा मुंह से बाहर लटकता रहना चाहिए ताकि उसे आसानी से खींचा जा सके।

यदि कपड़ा बाहर नहीं आता है तो अधिक से अधिक पानी पी लें। अब कमर से आगे की ओर झुककर कपड़ा बाहर खींचें।

वस्त्रधौति की फायदे

आयुर्वेद के अनुसार कफदोष का स्थान छाती एवं उदर का बलगम वाला तत्व है। इस क्रिया से छाती का बलगम ढीला होकर निकल जाता है।

यह दमा के उपचार के लिए बहुत उपयोगी योग है।

वस्त्रधौति पेट की दीवारों को ठीक से साफ करती है तथा पाचन तंत्र में भोजन आगे बढ़ने की गति एवं पाचन रसों का स्राव बढ़ाती है।

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