कौन सा आसन किस रोग में करें

वैसे तो लगभग 84 लाख योगाभ्यास है लेकिन सेहतमंद रहने के लिए कुछ आसन का प्रैक्टिस करना ही काफी होता है।  यहां पर हम कुछ योग अभ्यास के बारे में जिक्र करेंगें जिसको नियमित रूप से करने पर आप बहुत सारी बीमारियों से अपने आप को बचा सकते हैं।

 

किस रोग में कौन सा योग-Yoga for different diseases in Hindi

  • पद्मासन: मन की शांति, मन को एकाग्र करने के लिए, यौन रोग ,हर्निया, आँख, आँतों के रोग, ब्रह्मचर्य, बवासीर और ध्यान के लिए बहुत उपयोगी है।
  • शवासन: उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, अनिद्रा, सिरदर्द, शारीरिक थकावट, तनाव और मानसिक थकान के लिए लाभदायक है।
  • उत्तानपादासन – मोटापा, बवासीर, नाभि टलना, घुटने का दर्द, सायटिका, हार्निया, श्वास रोग, गैस, कमर दर्द, टाँगों की दुर्बलता, कब्ज, मोटापा कम करने के लिए और पेट दर्द जैसे रोग के लिए बहुत मुफीद है।
  • पवनमुक्तासन:  मोटापा, गैस, यकृत, गठिया, शुगर, हल्का पेट दर्द, आँतों के रोग, अम्लपित्त, सियाटिका, चर्बी कम करना, हृदय, स्त्रीरोग, आदि के लिए कारगर है।
  • पश्चिमोत्तानासन: मोटापा, कब्ज, मधुमेह, आमवात, कृमि, दोश, हार्निया, पौरूश शक्ति, वीर्य, बौनापन, बवासीर, गठिया, जठराग्नि, कद और पृश्ठभाग की मांसपेशिया के लिए लाभकारी है।

    कौन सा आसन किस रोग में करें
    आसन

 

  • चक्रासन:  मोटापा, कमर दर्द, कब्ज, मधुमेह, नाभि टलना, आमवात, कृमि दोश, गर्भाशय रोग और बौनापन के लिए सही है।
  • सर्वांगासन: इस आसन को आसनों का रानी कहा गया है।  इसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है।  अनिद्रा, बवासीर, गैस, नेत्ररोग, वीर्यदोश, सूजन, गला, यकृत, खाँसी, मोटापा, दुर्बलता, कृमि, गर्भाशय दोश, फेफडे, कद वृद्धि, दमा, उदर, हर्निया, हल्का पेट दर्द, बाल सफेद, पिट्यूटरी ग्रंथि, अजीर्ण-बदहजमी, जुकाम, तिल्ली-प्लीहा, पांडु रोग, तनाव, मंदाग्नि, कब्ज, कुश्ठ, शुक्रग्रंथि, एड्रिनल ग्रंथि और थायरायड  में उपयोगी है।
  • हलासन :  मोटापा, अनिद्रा, कब्ज, दमा, मधुमेह, गला, यकृत, तनाव, बौनापन, दुर्बलता, जुकाम, कंठमाला, अजीर्ण, मंदाग्नि, खांसी, वात, कब्ज, बुढापा, जुकाम, तिल्ली-प्लीहा, मानसिक रोग, हृदय रोग, थायरायड, डायबिटीज, स्त्रीरोग, अग्नाशय, अग्नाशय और रीड की हड्डी के लिए उपयुक्त है।
  • मत्स्यासन: बवासीर, अजीर्ण-बदहजमी, जुकाम, पैर, दमा, गला, सर्वाइकल व स्लिप डिस्क, मंदाग्नि, यकृत, कौन सा आसन किस रोग में करें फेफडे, गठिया, तनाव, मासिकधर्म, बाल सफेद, नाभिटलना, कब्ज, गठिया, मंदाग्नि, हार्निया, आँतों के रोग, थायराॅयड, पैराथायराॅयड, एड्रिनल ग्रंथि विकार आदि।
  • मयूरासन – मोटापा, अजीर्ण-बदहजमी, कृमि, मंदाग्नि, कब्ज, गैस, आमवात, जठराग्नि, बवासीर, तिल्ली, यकृत, गुर्दे, अमाशय, अग्नाशय, मधुमेह  के लिए ऊतम है।
  • उष्ट्रासन: कमरदर्द, मोटापा, गैस दमा, गला, सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, फेफडे, गठिया, नेत्र रोग, पांडु, बौनापन, सियाटिका, श्वसन तंत्र और थायराॅयड के लिए अहम है।
  • वज्रासन: गैस, मंदाग्नि, मधुमेह, फेफडे, पीलिया, साईटिका, अपचन, अम्लपित्त, कब्ज  और ध्यान के लिए अच्छा है।
  • सुप्त वज्रासन : गला, सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, गठिया, मासिकधर्म, कमर दर्द, कब्ज, थायराइड, गले के रोग, दमा, तनाव, पौरष शक्ति, खाँसी, पेट, बडी आँत, नाभि, गुर्दों के रोग बवासीर और फेफडे के लिए जरूरी है।
  • अर्द्धमत्स्येन्द्रासन: कमरदर्द, अजीर्ण-बदहजमी, मधुमेह, आमवात, कृमि, फेफडे, कब्ज, सायाटिका, वृक्कविकार, सर्वाइकल व स्लिप-डिस्क, रक्त संचरण, उदरविकार और आँत के हेल्थ के लिए जरूरी है।
  • गौमुखासन: दमा, फेफडे, कमरदर्द, हृदय दुर्बलता, गठिया, सर्वाइकल व स्लिप-डिस्क, सन्धिवात, मधुमेह, यकृत, हृदय रोग, अनिद्रा, रीढ का टेढापन, गुर्दे, स्वप्नदोश, गर्दन तोड बुखार, बहुमूत्र अंडकोश वृद्धि, आंत्र वृद्धि, बहुमूत्र, धातुरोग तथा स्त्री रोग आदि।
  • भुजंगासन: अजीर्ण, बदहजमी, मंदाग्नि, मधुमेह, नाभि टलना, सर्वाइकल, व स्लिपडिस्क, गला, यकृत, गर्भाशय दोष  तिल्ली-प्लीहा, खाँसी, बौनापन, कमरदर्द, दमा, कटिवात, जांघों का दर्द मासिक धर्म और कुबडापन के लिए लाभकारी है।  कहा जाता है की हर औरत को इस आसन का नियमित अभ्यास करनी चाहिए।
  • शलभासन : कब्ज, मंदाग्नि, यकृत, रीढ तथा कमर का दर्द, अजीर्ण, दुर्बलता, मेरूदण्ड के निचले भाग, सियाटिका का दर्द में कारगर है।
  • नौकासन: मोटापा अजीर्ण-बदहजमी, मधुमेह, नाभि टलना, हृदय, फेफडे, आमाशय, अग्नाशय आँत और यकृत के लिए मुफीद है।
  • धनुरासन: मोटापा, कमरदर्द, वीर्यदोश, गठिया, नाभि टलना, बौनापन, शारीरिक थकावट, तनाव, अजीर्ण-बदहजमी, सायटिका, गैस, गुर्दे, सर्वाइकल, स्पाॅण्डलाइटिस, उदर के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
  • गरूडासन: गठिया, घुटने का दर्द, हर्निया, सायटिका, अण्डकोश वृद्धि, पौरुष शक्ति, मूत्ररोग, गुर्दे, मोटापा, गुप्त रोगों में, हाइड्रोसिल, बवासीर, हाथ पैर की अन्य विकृति आदि।
  • योगमुद्रासन: मोटापा, अनिद्रा, बवासीर, गैस अजीर्ण-बदहजमी, वीर्य दोश, यकृत, गठिया, हल्का पेट दर्द, पौरुष शक्ति, कब्ज, फेफडे संबधी रोग, प्लीहा उदर, डायबिटीज, जठराग्नि, माईग्रेन आदि।
  • शीर्षासन: अनिद्रा, वीर्यदोश, जुकाम, मधुमेह, सूजन, खाँसी, कृमि, बाल-सफेद, तनाव, गर्भाशय दोश, शिरपीडा, कान, आँख, नेत्र रोग, मोटापा, सिर के बाल उडना, झुर्रियां पडना, वीर्यपात, पिट्युटरी एवं पीनियल ग्रंथि, मेधा-स्मृति, प्रमेह, नपंुसकता, थायराॅयड, अमाशय, आँत, वेरिकोज वेन्स, कब्ज, हार्निया, यकृत, आदि।
  • ताडासन: बौनापन, सर्वाइकल, स्लिप डिस्क, कद आदि में फायदेमंद है।
  • उत्कटासन: कमरदर्द, सूजन, कब्ज, गठिया, हार्निया, पथरी, घुटने का दर्द, सायाटिका, बेरी-बेरी, ब्रह्मचर्य, बवासीर में लाभ देता है।
  • शशकासन: कमरदर्द, तिल्ली, प्लीहा, पाचन शक्ति, थायराॅयड, स्त्रीरोग, हृदयरोग, तनाव, मानसिक रोग, गर्भाशय आँत, यकृत अग्न्याशय, गुर्दो, मोटापा
  • जानुशिरासन : अजीर्ण, आँतों के रोग, कटिवात, मधुमेह, जांघो के रोग, तिल्ली, प्लीहा, पांडुरोग, नाभि पश्चिमोत्तासन के समान लाभ आदि।
  • पाद-हस्तासन: कमर दर्द, कटिवात, जांघों का दर्द, तिल्ली, प्लीहा, मानसिक रोग, कदवृद्धि, पेट आदि।
  • मण्डूकासन: डायबिटीज, उदर व हृदयरोग, अग्न्याशय आदि।
  • मर्कटासन: सर्वाइकल स्पाण्डलाइटिस, स्लिप डिस्क, सियाटिक, कमर दर्द, पेटदर्द, कब्ज, दस्त, गैस, नितम्ब, जोडो के दर्द आदि।
  • सिंहासन: थायराॅयड, टाॅसिल, कान का रोग, गला रोग, हकलाना, तुतलाना आदि।
  • वक्रासन: डायबिटीज, कमर की चर्बी कम करने, यकृत व तिल्ली आदि।
  • वृक्षासन: मन की चंचलता, स्नायुमंडल, वीर्य, नेत्र रोग, धातुरोग, कफ रोग, हृदय, फेफडे आदि।
  • तिर्यक् ताडासन: कटि प्रदेश लचीला,पाश्र्व भाग की चर्बी को कम करना आदि।
  • कटि चक्रासन: कब्ज, आँत, गुर्दे, तिल्ली, अग्न्याशय, मासिक धर्म, कमर गर्दन, शरीर में जकडन आदि।
  • कोणासन: कमर माँस पेशियों के दर्द, फेफडों की कमजोरी, स्त्री के लिए उपयोगी आदि।
  • त्रिकोणासन: कटि प्रदेश लचीला, पाश्र्व भाग की चर्बी को कम करना, पृश्ठांश की मांस पेशियों को बल, छाती का विकास आदि।
  • मकरासन: स्लिप डिस्क, सर्वाइकल स्पाॅण्डिलाइटिस, सियाटिका, अस्थमा, घुटनों का दर्द, फेफडो के रोग आदि।
  • अर्धहलासन: मोटापा, नाभि टलना, गर्भाशय, आँत, टाँग, उत्तानपादासन के समान लाभ आदि।
  • कटि उत्तानपादासन: स्लिप डिस्क, सियाटिका, कमर दर्द आदि।
  • पादवृत्तासन: जंघा, नितम्ब एवं कमर दर्द, पेट सुडौल, आँत, मोटापा, उदर रोग आदि।
  • द्विचक्रिकासन: मोटापा,कमर दर्द, पेट, आँत, कब्ज, मंदाग्नि, अम्लपित्त और उदर रोग।
  • कन्धरासन: सूर्य केन्द्र (नाभि), मासिक विकृति, श्वेत-प्रदर, रक्त प्रदर व धातुरोग, गर्भाशय, पेटदर्द और कमर दर्द।
  • कूर्मासन: अग्न्याशय, उदर, हृदय आदि।
  • पूर्णमत्स्येन्द्रासन: मधुमेह, कमर दर्द, मेरूदण्ड और उदर।
  • बालासन (विश्रामासन): मानसिक तनाव (डिप्रेशन), अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, थकान, नकारात्मक, चिन्तन, स्नायु दुर्बलता, शरीर, मन, मस्तिश्क, आत्मा को विश्राम, शक्ति, उत्साह, आनन्द आदि।
  • सेतुबन्ध आसन: स्लिप डिस्क, कमर,ग्रीवा-पीडा  और उदर।
  • पूर्ण या विस्तृत भुजंगासन: सर्वाइकल स्पाण्डलाइटिस, स्लिप डिस्क, भुजंगासन के समान लाभ आदि।
  • पूर्ण धनुरासन: मेरूदण्ड लचीला, सर्वाइकल स्पाण्डलाइटिस, कमर दर्द, उदर,नाभि टलना, मासिक धर्म और गुर्दों के रोग।
  • विपरीत नौकासन (नाभि आसन): मेरूदण्ड रोग, नाभि गैस, यौन रोग, पेट, कमर व मोटापा।  स्त्रियों को यह आसन नहीं करनी चाहिए।
  • अर्धचन्द्रासन: श्वसन तंत्र, फेफडा, सर्वाइकल स्पाण्डलाइटिस, सियाटिका थायराॅयड आदि।
  • सिद्धासन: ब्रह्मचर्य, कामवेग, बवासीर, यौन रोग, कुण्डिलिनी जागरण, हृदय रोग, दमा, शुगर, स्मरण शक्ति और एकाग्रता ।
  • कुक्कुटासन: हाथ एवं कन्धे के लिए।
  • उत्तान कुक्कुटासन: हाथ एवं कन्धे के लिए लाभदायक है।
  • गर्भासन: जठराग्नि और  पाचन तन्त्र के लिए लाभदायक है।
  • पर्वतासन: मन की एकाग्रता में कारगर है।
  • मार्जारासन: कटि-पीडा, गुदा भ्रंश, फेफडा, पेट की चर्बी और गर्भाशय बाहर निकलने के रोग में।
  • वृश्चिकासन: जठराग्नि, उदर, मूत्रविकार, मुखकान्ति आदि।
  • गोरक्षासन:  ब्रह्मचर्यासन का पूरक, इन्द्रियों की चंचलता, मन को शांति प्रदान करता है।
  • बकासन: हाथों की स्नायुओं को बल, मुख कान्ति, मोटापा और पेट रोग में अहम रोल अदा करता है।
  • नटराजासन: हाथ पैर की स्नायु का विकास में लाभदायक है।
  • वातायनासन: घुटने के विकार, जंघाओं में जलन की वृद्धि करना, हर्निया आदि।
  • तिर्यक भुजंगासन: मेरूदण्ड से सम्बन्धित रोगो में , कमर, सर्वाइकल, कमरदर्द, सियाटिका आदि रोगों में लाभदायक है।
  • कटिआसन: स्लिप डिस्क, कमर, ग्रीवा-पीडा और गर्भावस्था के शुरूवाती माह में फायदेमंद है।
  • कन्धरासन : मासिक विकार, थायराइड, गर्भावस्था के शुरूवाती माह में, स्लिप डिस्क, कमर, ग्रीवा-पीडा और उदर की बिमारियों को रोकता है।
  • हनुमानासन: कूल्हे, जांघ, घुटने मजबूत व लचीली मांसपेशियां, नाभि के निचले भाग की हड्डी लचीली, सियाटिका, प्रजनन शक्ति, मासिक धर्म, कमर पतली आदि ।
  • बद्धकोणासन (तिल्ली आसन) – शरीर लचीला, थकान दूर, प्रसव का आसन, जांघो व घुटनों में खिंचवा लाता है।

Recommended Articles:

Leave a Comment