योग: योग क्या है, योगासन क्या है ?

योग क्या है ? What is Yoga

योग की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘युज्’ से हुआ है, जिसका अर्थ होता है  ‘ जोड़ना ‘।  योग का उद्भव आज से करीब 5 हजार साल पहले भारत में हुआ। बहुत सारे लोग इसको सिर्फ शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं लेकिन योग दुखों एवं कष्टों से मुक्ति प्राप्त करने के लिए आत्मा एवं परमात्मा के मिलन का प्रतीक है।पाणिनी के व्याकरण के अनुसार ‘योग’ शब्‍द के तीन अर्थ हैं – मिलन (युजिर्योगे), समाधि (युज समाधौ) एवं संयम (युज संयमने)।padmasana-steps-benefits-precaution

योग शरीर का मरोड़ना एवं खींचना ही नहीं है बल्कि यह आपको एक पूर्ण जीवन शैली सिखाता है। यह मन और आत्मा के बीच का एक लिंक है।

योग एक ऐसी विद्या है जिसके मदद से आप शरीर, मन और मस्तिष्क को पूर्ण रूप से स्वस्थ  रख सकते हैं। योग सिर्फ आपको बीमारियों से ही नहीं बचाता बल्कि शारीरिक और मानसिक स्तर पर तालमेल बैठाता है।

योग आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हुए आपकी जीवन को एक नई दिशा दिखाता है।

यह शरीर को लचीला बनाने में मदद करता है और मन को शांत करते हुए आप को तनाव, चिंता, गुस्सा, डिप्रेशन इत्यादि चीजों से आपको बचाता है।

योग का पतंजलि योगसूत्र में इस तरह से दर्शाया गया है।  अपने दूसरे सूत्र में पतंजलि, योग इस तरह से परिभाषित करते हैं:
” योग: चित्त-वृत्ति निरोध: “- योग सूत्र 1.2

 

आसान क्या है ? What is yogasana

आसन शब्द संस्कृत शब्द ‘अस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है बैठना। आसन को तब तक धारण करना चाहिए जब तक सुविधापूर्वक उस अवस्था में रह सकें।  महर्षि पतंजलि  के अनुसार योग को आठ अंग में बांटा गया है। पतंजलि  के अष्टांगयोग में आसन को तीसरे स्थान पर रखा गया है। और उन्होंने आसन को बहुत सरल तरीके से प्रभासित किया है।

स्थिरसुखमासनम्। – पा. यो. सू. 2/46

इस परिभाषा के अनुसार कोई भी शारीरिक मुद्रा जो लंबे समय तक बनाए रखा जा सके उसे कहा जा सकता है।

आज कल के जमाने में योगासन का महत्व इतना बढ़ गया है कि बहुत सारे लोग योगासन को ही योग समझते हैं।

योग के विभिन्य योगग्रंथों में आसन को इस तरह से दर्शाया गया है।

अष्टांगयोग

अष्टांगयोग में आसन को तीसरा स्थान प्राप्त  है।

यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि। – पा. यो. सू. 2/29

गोरक्षशतक

योगी गोरक्षनाथ ने गोरक्षशतक में षडांगयोग के बारे में बहुत कुछ कहा है  और उन्होंने आसनों को पहला स्थान दिया है।

आसनं प्राणसंयामः प्रत्याहारोऽव धारणा।ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट्।। गो. श. 4

हठप्रदीपिका

हठप्रदीपिका में आसन को प्रथम स्था्न दिया गया है।

हठस्य प्रथमाङगत्वादासनं पूर्वमुच्यते। – ह.प्र.1/17

घेरंडसंहिता

घेरंडसंहिता में घेरंडार्षि ने आसन दूसरा स्थान दिया है।

शोधनं दृढ़ता चैव स्थैर्य धैर्य च लाधवम्। प्रत्यक्षं च विनिर्लिप्तं घटस्य सप्तसाधनम्। घे. सं. 1/9

हठयोग में आसनों को बहुत ज़्यदा विस्तृ्त वर्णन किया गया है।

सिद्धसिद्धांतपद्धति

योग ग्रंथ सिद्धसिद्धांतपद्धति में आसन को इस तरह से दर्शाया गया है-‘साधक के अनुकूल साधक की स्थिरता’ ही योगासन की मुख्य विशेषता है।

आसनमिति स्वस्वरूपे समासन्नतर । सि.सि.प. 2/48

योगरसायन

योगरसायन के अनुसार अन्य यौगिक क्रियाएं करने के लिए आसन का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। इसके हिसाब से आसन से मन एवं मस्तिष्क दोनों शांत दिशा की ओर बढ़ता है।

 

घेरंडसंहिता में घेरंडार्षि को 32  आसनों का जिक्र किया है जिसको प्रैक्टिस कर आदमी स्वस्थ रह सकता है।

  1. सिद्धासन
  2. पद्मासन
  3. भद्रासन
  4. मुक्तानसन
  5. वज्रासन
  6. स्वरस्तिकासन
  7. सिंहासन
  8. गोमुखासन
  9. वीरासन
  10. धनुरासन
  11. शवासन
  12. गुप्तानसन
  13. मत्याानसन
  14. मत्येंनद्रासन
  15. गोरक्षासन
  16. पश्चिमोत्तातनासन
  17. उत्कटासन
  18. संकटासन
  19. मयूरासन
  20. कुक्कुाटासन
  21. कूर्मासन
  22. उत्ताननकूर्मासन
  23. उत्तानमंडूकासन
  24. वृक्षासन
  25. मंडूकासन
  26. गरुड़ासन
  27. ऋषभासन
  28. शलभासन
  29. मकरासन
  30. उष्ट्रातसन
  31. भुजंगासन
  32. योगासन

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