नौली योग क्रिया विधि, लाभ और सावधानियां

नौली किया है ?

‘नौली’ एक योग शोधन क्रिया है जो संभवतः ‘नाल’ शब्द से निकला है, जिसका अर्थ होता है नाभि से लगी नाल अथवा रेक्टस एब्डॉमिनिस पेशी। रेक्टस एब्डॉमिनिस पेशी उदर गुहा की सामने की दीवार बनाती है तथा उसका प्रयोग ट्रांसवर्स एब्डॉमिनिस जैसी दूसरी पेशियों के साथ किया जाता है। साधारण व्यक्ति नौली को पेट की मालिश या पेट को घुमाना के तौर पर समझ सकते हैं। अगर इसको साइंस के शब्दों में समझा जाय तो यह रेक्टस एब्डॉमिनिस पेशियों को सिकोड़ने एवं फैलाने की क्रिया है। घेरंडसंहिता में इसे लौलिकी भी कहते हैं। प्राचीन ग्रंथ हठप्रदीपिका में इस योग क्रिया की निम्न परिभाषा हैःNauli for diabetes, acidity

अमन्दावर्तवेगेन तुन्दं सव्यापसव्यतः।
नतांसोभ्रामयेदेषा नौलिः सिद्धैः प्रचक्ष्यते। – ह.प्र. 2/33

नौलि योग विधि

नौलि की विधि समझना बहुत जरूरी है क्योंकि इसको सही तरीके से न करने पर लाभ तो नहीं होगा लेकिन थोड़ा बहुत नुकसान हो सकता है। इसलिए इसका सही लाभ उठाने के लिए पहले इसे किसी विशेषज्ञ के देखरेख में सीखे। यहां पर इसके विधि को बहुत सरल तौर पर समझाया जा रहा है जिसके सहायता से आप इसे अपने घर में अच्छी तरह प्रैक्टिस कर सकते हैं।

  • सीधे खड़े हों तथा पैरों के बीच लगभग डेढ़ फुट की दूरी रखें।
  • हाथों को जांघों के किनारे रखें। गहरी सांस लें।
  • अब आगे झुकें और हाथों को घुटनों के ऊपर रखें।
  • सांस पूरी तरह छोड़ दें। उड्डीयान बंध की सहायता से पेट को कमर की ओर खींचें तथा रेक्टस एब्डॉमिनस को ऊपर की ओर खींचें।
  • अब आप अपने पेट को clockwise एवं anti -clockwise घुमाएं।
  • उड्डीयानबंध को खोल दें, खड़े हो जाएं और धीरे-धीरे सांस खींचें।
  • यह क्रिया दोहराएं।
  • लगातार अभ्यास करने से रेक्टस एब्डॉमिनिस अलग दिखने लगेगी।
  • आप अपने पेट की ओर देख सकते हैं और महसूस कर सकते हैं कि आपको कितनी सफलता मिलती है।
  • दस-बारह दिन के अभ्यास के बाद रेक्टस एब्डॉमिनिस पेशी पर नियंत्रण होने लगता है।
  • शास्त्रों में कहा गया है कि यह क्रिया करने वालों को इसके बाद चावल की खीर का सेवन करना चाहिए।

नौली क्रिया के प्रकार

नौली योग क्रिया के तीन प्रकार होते हैं।

  • मध्यनौली
  • दक्षिणनौली
  • वामनौली

मध्यनौली
उड्डीयानबंध करें, उसके बाद गुदा एवं उदर की पेशियों को सिकोड़ें ताकि पेट के सामने वर्टीकल चाप बन जाए। उड्डीयानबंध के साथ यह क्रिया दोहराएं।

दक्षिणनौली
मध्यनौली करें, उसके उपरांत रेक्टस एब्डॉमिनी पेशी को दाईं ओर करते हुए दबाव के बगैर जितना हो सके सिकोड़ें। पुनः मध्यनौली में लौट आएं। यदि आप बाएं हाथ को घुटने से उठा लेते हैं और पूरा दबाव दाएं हाथ तथा घुटने पर डालते हैं तो दक्षिणनौली आसान हो जाती है। इससे रेक्टस एब्डॉमिनी पेशी स्वतः ही दाईं ओर हो जाती है।

वामनौली
मध्यनौली करें, उसके उपरांत रेक्टस एब्डॉमिनी पेशी को बाईं ओर करते हुए दबाव के बगैर जितना हो सके सिकोड़ें। पुनः मध्यनौली में लौट आएं। यदि आप दाएं हाथ को घुटने से उठा लेते हैं और पूरा दबाव बाएं हाथ तथा घुटने पर डालते हैं तो वामनौली आसान हो जाती है। इससे रेक्टस एब्डॉमिनी पेशी स्वतः ही बाईं ओर हो जाती है।

नौलि के लाभ

  • हठप्रदीपिका के अनुसार यह योग क्रिया एक अति उत्तम योग शोधन विधि है। यह पाचन को ठीक करने के लिए रामबाण है। पेट के जूस के स्राव में मदद करता है, अपच, देर से पाचन आदि दोषों से संबंधित सभी विकारों को दूर करती है तथा प्रसन्नता प्रदान करती है। हठप्रदीपिका में इसका विपरण इस तरह है।
    मन्दाग्निसंदीपन पाचनादिसंधायिकानन्दकरी सदैव।
    अशेषदोषामयशोषणी च हठक्रियामौलिरियं च नौलिः।। – ह.प्र. 2/34
  • नौली के दौरान पूरे पेट को घुमाने, नचाने और सिकोड़ने से पेट के सभी पेशियों एवं अंगों की मालिश होती है तथा वे सुदृढ़ होते हैं।
  • यह शरीर में गर्मी उत्पन्न करती है तथा पाचन अग्नि को सक्रिय करती है।
  • यह अंतःस्रावी क्रियाओं को संतुलित करती है, हॉर्मोन को नियमित करती है।
  • यह कबि्ज़यत को काटती है।
  • एसिडिटी को कम करता है। पेट गैस जैसे विकारों से नजात दिलाता है।
  • सुस्ती को भागने में मदद करता है।
  • मधुमेह वाले रोगियों के लिए बहुत अच्छी क्रिया है और शुगर को कम करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
  • यौन एवं मूत्र विकार कम करने में लाभकारी है।
  • गूढ़ स्तर पर नौली का प्राणमय कोशा तथा मनोमय कोशा पर गहन प्रभाव होता है।
  • इसके करने से मस्तिष्क में स्पष्ट विचार आते हैं।
  • यह आंतों के विभिन्न अंगों की गतिशीलता बढ़ाती है तथा तंत्रिका तंत्र एवं उनके बारीक केंद्रों की सक्रियता में मदद करती है।
  • एक ओर यह उदर में अधिक रक्त पहुंचाती है और दूसरी ओर उदर की खोखली आंतों से विभिन्न पदार्थों को बाहर करने जैसे मल, मूत्र एवं प्रजनन-मूत्र स्रावों को बाहर करने की गति पर अधिक नियंत्रण प्रदान करती है।

नौली क्रिया की सावधानियां

  • हृदय रोग से पीड़ित लोगों को नौलि नहीं करनी चाहिए।
  • हर्निया, उच्च रक्तचाप, आमाशय अथवा छोटी आंत के अल्सर से पीड़ित व्यक्तियों को यह नहीं करनी चाहिए।
  • गर्भावस्था के दौरान इसको करना सख्ती से मनाई है।
  • पेट के आपरेशन के बाद या पेट में कोई चोट लगी हो तो इसे न करें।
  • यदि इस क्रिया के दौरान पेट में दर्द का अनुभव होता है तो इसे तुरंत रोक दिया जाना चाहिए।

Recommended Articles:

2 Comments

  1. Avatar for Admin DILIP KUMAR July 23, 2017
    • Avatar for Admin Tanvi July 25, 2017

Leave a Reply